महाद्वीप की परिभाषा को लेकर विद्वानों के मध्य पूर्ण सर्वसम्मति नहीं पाई जाती, तथापि सामान्यतः महाद्वीप को पृथ्वी की सतह पर अवस्थित ऐसे विशाल स्थलीय भू-भाग के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसकी भौगोलिक सीमाएँ तुलनात्मक रूप से स्पष्ट हों और जो समुद्री अथवा महासागरीय विस्तारों द्वारा अन्य भू-भागों से पृथक होता हो। दूसरे शब्दों में, पृथ्वी के स्थलमंडल का वह विस्तृत एवं सतत भाग, जो अपने क्षेत्रफल, संरचनात्मक एकत्व तथा भौगोलिक विशिष्टता के कारण पृथक अध्ययन की इकाई के रूप में स्वीकार्य हो, महाद्वीप कहलाता है। प्रचलित भौगोलिक वर्गीकरण के अनुसार पृथ्वी को सात महाद्वीपों एशिया, अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका में विभाजित कर अध्ययन किया जाता है।

एशिया : नाम, अर्थ एवं ऐतिहासिक महत्ता

‘एशिया’ शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में सामान्यतः यह मत स्वीकार किया जाता है कि इसका उद्गम हिब्रू अथवा असीरियन मूल के ‘आसू’ शब्द से हुआ, जिसका आशय ‘उदित सूर्य’ अथवा ‘पूर्व’ से है। इस व्युत्पत्तिगत अर्थ-संरचना के कारण एशिया को सांस्कृतिक रूप से ‘उदय की भूमि’ भी माना गया है। एशिया को विविध विशेषणों द्वारा अभिहित किया गया है, जैसे—‘महाद्वीपों का महाद्वीप’, ‘नदी-सभ्यताओं का पालना’, ‘विश्व धर्मों की जन्मभूमि’, ‘पक्षियों का देश’ तथा ‘भूत और भविष्य का महाद्वीप’। ये संज्ञाएँ साहित्यिक अलंकरण नहीं हैं, बल्कि एशिया की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक विशिष्टताओं की संकेतक भी हैं।

विश्व के प्रमुख धर्म—हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, इस्लाम, ईसाई तथा यहूदी परंपराएँ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से एशिया में उद्भूत, विकसित अथवा संस्थापित हुईं। इसी प्रकार मेसोपोटामिया, सिन्धु, ह्वांग-हो तथा यांग्त्सी जैसी नदी घाटियों में विकसित सभ्यताओं ने मानव इतिहास की आधारभूत संरचना निर्मित की। इस दृष्टि से एशिया केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के उद्भव, विकास और विस्तार का मूलाधार है।

एशिया विश्व का सर्वाधिक विस्तृत एवं सर्वाधिक जनसंख्या वाला महाद्वीप है। यह भौगोलिक विस्तार, जैव-भौतिक विविधता, सांस्कृतिक बहुलता तथा भू-राजनीतिक जटिलता की दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट है। एशिया की सीमाएँ पश्चिम में यूरोप तथा दक्षिण-पश्चिम में अफ्रीका से संबद्ध हैं, जिससे यह महाद्वीप अंतरमहाद्वीपीय संपर्क, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामरिक प्रतिस्पर्धा का ऐतिहासिक केंद्र बनता है। इस प्रकार एशिया एक भौगोलिक इकाई ही  नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के दीर्घकालिक विकास का केंद्रीय भू-क्षेत्र भी है।

एशिया का राजनैतिक-भौगोलिक विभाजन

राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामरिक तथा भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर एशिया को सामान्यतः छह प्रमुख उपक्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। यह विभाजन विश्लेषणात्मक सुविधा प्रदान करता है तथा क्षेत्रीय विशेषताओं को अधिक सुव्यवस्थित ढंग से समझने में सहायक है।

1. उत्तरी एशिया (साइबेरिया)

उत्तरी एशिया, जिसे प्रायः साइबेरिया कहा जाता है, एशिया के उच्च अक्षांशीय भाग का प्रतिनिधित्व करता है। इसके उत्तर में आर्कटिक महासागर, पूर्व में प्रशांत महासागर तथा पश्चिम में यूरोप स्थित है। यह क्षेत्र अत्यधिक निम्न तापमान, दीर्घ शीत ऋतु, स्थायी हिमावरण तथा विरल जनसंख्या के लिए प्रसिद्ध है। यूराल पर्वतमाला एवं यूराल नदी परंपरागत रूप से एशिया और यूरोप के मध्य भौगोलिक विभाजक मानी जाती हैं, जबकि पूर्व में बेरिंग जलसंधि एशिया को उत्तरी अमेरिका से पृथक करती है। साइबेरिया का अधिकांश भाग रूस के अधीन है। खनिज, वन, प्राकृतिक गैस तथा अन्य संसाधनों की प्रचुरता के कारण इसे ‘भविष्य का भंडारगृह’ कहा जाता है।

2. मध्य एशिया

मध्य एशिया एशिया के आंतरिक स्थलभाग का प्रतिनिधि क्षेत्र है, जिसमें ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान सम्मिलित हैं। यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह यूरोप, रूस, चीन तथा दक्षिण एशिया के मध्य संपर्क सेतु का कार्य करता है। प्राकृतिक संसाधनों, विशेषतः यूरेनियम, प्राकृतिक गैस तथा खनिज संपदा की दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत समृद्ध है। कजाकिस्तान विश्व में यूरेनियम उत्पादन का अग्रणी देश है तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा स्थलबद्ध राष्ट्र है।

3. दक्षिण एशिया

दक्षिण एशिया में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान, श्रीलंका तथा मालदीव सम्मिलित हैं। यह क्षेत्र जनसंख्या घनत्व, सांस्कृतिक विविधता, ऐतिहासिक निरंतरता तथा मानसूनी जलवायु के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) इस क्षेत्र का प्रमुख क्षेत्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 1985 ई. में हुई तथा जिसका मुख्यालय काठमांडू (नेपाल) में स्थित है। भारत इस क्षेत्र की केंद्रीय शक्ति है, जिसका प्रभाव सामरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सभी स्तरों पर दृष्टिगोचर होता है।

4. दक्षिण-पश्चिम एशिया

दक्षिण-पश्चिम एशिया, जिसे प्रायः पश्चिम एशिया अथवा मध्य-पूर्व भी कहा जाता है, में साइप्रस, सीरिया, तुर्की, इराक, ईरान, लेबनान, इज़राइल, जॉर्डन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, यमन तथा कुवैत जैसे देश सम्मिलित हैं। यह क्षेत्र विश्व-राजनीति का अत्यंत संवेदनशील भू-क्षेत्र है। विशाल पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस भंडारों के कारण इसका वैश्विक ऊर्जा-राजनीति में केंद्रीय स्थान है। धार्मिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इस्लाम, ईसाई तथा यहूदी परंपराओं के प्रमुख पवित्र स्थलों का केंद्र है।

5. दक्षिण-पूर्व एशिया

दक्षिण-पूर्व एशिया में म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रूनेई, फिलीपींस तथा इंडोनेशिया सम्मिलित हैं। यह क्षेत्र समुद्री व्यापार, सामुद्रिक संपर्क, उष्णकटिबंधीय जैव-विविधता तथा सांस्कृतिक बहुलता के लिए प्रसिद्ध है। इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा द्वीप-समूह राष्ट्र है, जिसमें लगभग 17,000 द्वीप सम्मिलित हैं। बोर्नियो (कालीमंतान) इस क्षेत्र का प्रमुख द्वीप है, जिस पर इंडोनेशिया, मलेशिया और ब्रूनेई का संयुक्त भू-राजनीतिक प्रभाव है।

6. पूर्वी एशिया

पूर्वी एशिया में चीन, जापान, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया तथा ताइवान सम्मिलित हैं। यह क्षेत्र विश्व की प्रमुख आर्थिक, औद्योगिक और तकनीकी शक्तियों का केंद्र है। चीन क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का तृतीय सबसे बड़ा राष्ट्र तथा जनसंख्या की दृष्टि से अग्रणी देश है। जापान एक अत्यंत विकसित द्वीपीय राष्ट्र है, जो उच्च तकनीकी विकास के साथ-साथ भूकंप, सुनामी तथा ज्वालामुखीय गतिविधियों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील है। ताइवान, हांगकांग तथा मकाऊ इस क्षेत्र के सामरिक और आर्थिक महत्व को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।

एशिया में देशों की संख्या

सामान्यतः एशिया में 50 संप्रभु राष्ट्रों को मान्यता दी जाती है। तथापि, यदि ताइवान, हांगकांग, मकाऊ, तिब्बत आदि क्षेत्रों को पृथक राजनीतिक इकाइयों के रूप में विचारित किया जाए, तो यह संख्या परिवर्तित हो सकती है। यह मानव सभ्यता के अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों का केंद्रीय भौगोलिक मंच है। अतः एशिया का अध्ययन केवल एक महाद्वीपीय अध्ययन न होकर, मानव इतिहास, वैश्विक शक्ति-संतुलन तथा सभ्यतागत विकास की समझ का आधार भी है।

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